अमरीकी प्रशासन के अनुसार, अभि
नेत्री जूडी गार्लेंड ने 'द विज़ार्ड ऑफ़ ऑज़' में जो रूबी जड़ित सैंडल पहनी थीं,
वह चोरी होने के 13 साल बाद वापस मिल गई हैं.
मिनेसोटा संग्रहालय से में इन सैंडल को आधी रात को चुरा लिया गया था.
1939 की इस फ़िल्म में गार्लेंड ने रूबी की तीन जोड़ी सैंडल पहनी थीं.
एक
अज्ञात शख़्स ने सैंडल और चोर का पता बताने वाले के लिए 10 लाख डॉलर की
इनामी राशि की भी घोषणा की थी. हालांकि, चोरी के 10 साल बाद इनाम की घोषणा
समाप्त हो गई थी.
यह अभी तक साफ़ नहीं है कि यह सैंडल कैसे वापस मिली है.
कहा जाता है कि यह सैंडल फ़िल्म इतिहास के सबसे महंगे सामानों में से एक थी.
इस सैंडल का बीमा 10 लाख डॉलर का था लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इसकी कीमत उस वक़्त से दो गुनी हो सकती है.रैंड रेपिड्स में जूडी गार्लेंड संग्रहाल
य में कलेक्टर माइकल शॉ से इस सैंडल को उधार लिया गया था.
इस सैंडल की चोरी को बेहद साधारण चोरी बताया गया था. शीशे को तोड़कर सैंडल निकाल ली गई थीं.
इस घटना के बाद पैरों और उंगलियों के कोई भी निशान नहीं मिले थे और उस रात को निगरानी करने वाले कैमरे भी काम नहीं कर रहे थे.
शॉ
ने न्यूज़वीक पत्रिका को 2015 में कहा था, "जब मुझे इस बारे में कॉल आया
तो मुझे सचमुच लगा कि जैसे किसी ने मेरे पेट में मुक्का मारा हो. "मेरे
घुटने मुड़ गए और मैं फ़र्श पर गिर गया. मैंने उन जूतों का 35 साल तक ध्यान
रखा था.""
संग्रहालय के सह-संस्थापक जॉन मिनर ने पत्रिका से कहा था
कि वह बर्बाद हो गए थे. उन्होंने कहा, "मैं रो रहा था. मैं विश्वास नहीं
कर सकता था कि यह हमारे साथ हुआ है क्योंकि यह बेहद बेवकूफ़ाना हरकत थी."
'किसने रूबी की सैंडल चुराई' नामक एक डॉक्युमेंट्री 2015 में रिलीज़ हुई थी.
हॉलिवुड रिपोर्टर के अनुसार, इस सैंडल में रूबी के 2,300 टुकड़े लगे हुए थे.
यह
फ़िल्म एल. फ़्रैंक बॉम की साल 1900 की किताब 'द वंडरफुल विज़ार्ड ऑफ़
ऑज़' पर आधारित थी. जिसमें डोरोथी नामक किरदार चांदी की जूते पहनती है.
हालांकि, एमजीएम स्टूडियो ने इसको हटाकर लाल रंग का चयन किया ताकि नए टेक्निकलर फ़िल्म तकनीक में इसे दिखाया जा सके.
चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा 2 अक्टूबर को
रिटायर होने जा रहे हैं. उनके कार्यकाल में अब क़रीब 20 दिन बचे हैं और
उनके सामने कई ऐसे मामले हैं जो देश की दशा और दिशा बदलने का दमखम रखते
हैं.
कम से कम दस ऐसे मुकदमे हैं जिन पर सुप्रीम कोर्ट की त
रफ़ से व्यवस्था या फ़ैसला आना है. इनमें राजनीतिक रूप से संवेदनशील माना जाने
वाला राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामला भी है, जो अगले कुछ हफ़्ते में सामने
होगा.
इसके अलावा चीफ़ जस्टिस की अगुवाई वाली बेंच के सामने आधार कार्ड का भविष्य भी तय होगा.
2
अक्टूबर को सेवानिवृत्त होने जा रहे चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई
वाली पीठों ने कई अहम मामलों में फ़ैसला सुरक्षित रखा है और उम्मीद जताई जा
रही है कि रिटायरमेंट से पहले इनमें से कुछ पर फ़ैसला आ सकता है.
आधार: कई याचिकाओं में 2016 आधार एक्ट की वैधानिकता को
चुनौती दी गई है. इसके अलावा सरकार की तरफ़ से जारी अधिसूचनाओं को भी
चैलेंज किया गया है.लोग चाहते हैं कि आईपीसी के सेक्शन 497 में बदलाव किया जाए. इसके
मुताबिक एडल्टरी (व्यभिचार) के अपराध की सज़ा केवल पुरुष को दी जाती है,
लेकिन याचिकाकर्ता चाहते हैं कि इसे जेंडर न्यूट्रल बनाया जाए.
राजनीति का अपराधीकरण: सुप्रीम कोर्ट इस बात का फ़ैसला भी करेगी कि जिन नेताओं के ख़िलाफ़
आपराधिक मामलों में चार्जशीट दाख़िल की गई है, क्या उनके चुनाव लड़ने पर
रोक लगाई जाए.
सांसद या वकील: सुप्रीम कोर्ट इस बात का फ़ैसला भी करेगी कि वकालत की पढ़ाई कर चुके सांसद क्या किसी मामले की पैरवी कर सकते हैं? र्ष अदालत इस बात का निर्णय करेगी कि क्या एम इस्मायल फ़ारुक़ी बनाम
यूनियन ऑफ़ इंडिया में पांच जजों की संवैधानिक पीठ के आदेश को दोबारा
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सुप्रीम कोर्ट को इस बात पर भी निर्णय लेना है कि क्या 12 साल पुराने
मामले में बदलाव की ज़रूरत है या नहीं? 2006 में सर्वोच्च अदालत ने
सार्वजनिक क्षेत्र में एस
सी/एसटी कर्मचारियों को प्रमोशन में आरक्षण के
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