Friday, August 17, 2018

अटल बिहारी वाजपेयी की भाषण कला: हंसाते भी थे, भावनाओं में बहाते भी थे

मई 1963 की बात है. मैंने पहली बार अटल बिहारी वाजपेयी को सुना था. पंडित दीनदयाल उपाध्याय जौनपुर से लोकसभा का चुनाव लड़ रहे थे.
उस समय चार उपचुनाव हो रहे थे. वडोदरा से मीनू मसानी चुनाव लड़ रहे थे, अमरोहा से जेबी कृपलानी और फर्रुखाबाद से डॉ. राम मनोहर लोहिया चुनावी मैदान में थे.
जौनपुर की सभा में मैंने वाजपेयी को पहली बार सुना. मैंने यह महसूस किया कि वाजपेयी लोगों को अपनी सभा में हंसाते भी हैं और भावनाओं में बहा भी देते हैं.
यही उनके भाषण की अद्भुत कला थी और उन्हें यह कला अपने पिता से मिली थी. इसके लिए उन्हें कोई ख़ास मशक्कत नहीं करनी पड़ी. वाजपेयी के भाषण में हास्य, विनोद और मुद्दे की बात हुआ करती थी.
वाजपेयी बिना किसी पर्ची के बोलते थे और मुद्दों को सही समय पर सटीक तरीके से रखते थे. उनकी सभा में हर विचारधारा के लोग उन्हें सुनने आते थे.
लोकसभा में चाहे अयोध्या का मामला हुआ या फिर अविश्वास प्रस्ताव का मामला, पूरा संसद उन्हें ध्यान से सुनता था.
विपक्षी सांसद उन्हें इसलिए भी सुनते थे क्योंकि वो भारतीय जनता पार्टी के होते हुए भी कई बार ऐसी बात भी करते थे जो राष्ट्रहित में होती थी और पार्टी लाईन से बाहर होती थी.
यही कारण है कि उन्हें किसी ख़ास पार्टी का नेता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय नेता माना जाता था.
अयोध्या मामले के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने लोकसभा में जो भाषण दिया, वो शायद अटल बिहारी वाजपेयी ही दे सकते थे. उन्होंने कहा था कि जिन लोगों ने बाबरी मस्जिद को ढहाने में हिस्सा लिया है उन्हें सामने आना चाहिए और ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए.
ये एक ऐसी बात थी जो भाजपा का दूसरा नेता नहीं कह पाता और इस बात को उन्होंने दबी जबान से नहीं कहा था.
वो लोकसभा में अपने भाषणों में कई बार ऐसे शब्दों का प्रयोग करते थे, जिसे दूसरे समझ नहीं पाते थे.
एक बार सीपीआई के कुछ नेता लोकसभा में उनका विरोध कर रहे थे. बोलने के दौरान वे उन्हें टोक रहे थे, तो उन्होंने कहा कि जो मित्र हमारे भाषण के दौरान टोक रहे हैं वो शाखामृग की भूमिका में हैं.
अब शाखामृग का मतलब किसी को समझ नहीं आया. थोड़ी देर बाद प्रकाश वीर शास्त्री ने बताया कि शाखामृग का मतलब होता है बंदर. इसके बाद विपक्षी भड़क गए.
उनके भाषण का विषय कितना भी नीरस होता था, वो उन्हें रोचक बना देते थे और हंसते-हंसाते लोगों को समझा देते थे.
विषय अगर पेचीदा होता तो वे मुहावरों और कहावतों के ज़रिए उसे सरल बना देते थे कि सुनने वाले को भी लगता था कि वो कोई नई बात कह रहे हैं.

No comments:

Post a Comment