भारतीय सिनेमा के दिग्गज संगीतकार मोहम्मद ज़हूर ख़य्याम हाशमी का सोमवार रात साढ़े नौ बजे 93 साल की उम्र में निधन हो गया.
पिछले कुछ समय से सांस लेने में दिक़्क़त के कारण उनका मुंबई के जुहू में एक अस्पताल में इलाज चल रहा था.
प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी समेत फ़िल्म, कला, राजनीति और अन्य क्षेत्रों से जुड़े लोगों ने ख़य्याम के निधन पर शोक जताते हुए श्रद्धांजलि दी है.
ख़य्याम संगीतकार रहमान के साथ मिलकर संगीत देते थे और जोड़ी का नाम था
शर्मा जी और वर्मा जी. वर्मा जी यानी रहमान पाकिस्तान चले गए तो पीछे रह गए
शर्मा जी.
बात 1952 की है. शर्मा जी कई फ़िल्मों का संगीत दे चुके थे और उन्हें ज़िया सरहदी की फ़िल्म फ़ुटपाथ का संगीत देने का मौक़ा मिला.
दिलीप कुमार पर फ़िल्माया गया गाना था -"शाम-ए-ग़म की क़सम आज ग़मगी हैं हम, आ भी जा, आ भी जा आज मेरे सनम..."
दूरदर्शन
की एक पुरानी इंटरव्यू में ख़य्याम बताते हैं, "एक दिन बातों का दौर चला
तो ज़िया सरहदी ने पूछा कि आपका पूरा नाम क्या है. मैंने कहा मोहम्मद ज़हूर ख़य्याम. तो उन्होंने कहा कि अरे तुम ख़य्याम नाम क्यों नहीं रखते. बस उस
दिन से मैं ख़य्याम हो गया."
इन्हीं ख़य्याम ने फ़िल्म कभी-कभी, बाज़ार, उमराव जान, रज़िया सुल्तान जैसी फ़िल्मों में बेहतरीन संगीत दिया.
18 फ़रवरी 1927 को पंजाब में जन्मे ख़य्याम के परिवार का फ़िल्मों से
दूर दर तक कोई नाता नहीं था. उनके परिवार में कोई इमाम था तो कोई मुअज़्ज़िन.
लेकिन उस दौर के कई नौजवानों की तरह ख़य्याम पर केएल सहगल का नशा था. वो उन्हीं की तरह गायक और एक्टर बनना चाहते थे. इसी जुनून
के चलते वे छोटी उम्र में घर से भागकर दिल्ली चचा के पास आ गए.
घर में ख़ूब नाराज़गी हुई लेकिन फिर बात इस पर आकर टिकी कि मशहूर पंडित हुसनलाल-भगतराम की शागिर्दी में वो संगीत सीखेगें.
कुछ समय सीखने के बाद वे लड़कपन के नशे में वो क़िस्मत आज़माने मुंबई चले गए लेकिन जल्द समझ में आया कि अभी सीखना बाक़ी है.
संगीत सीखने की चाह उन्हें दिल्ली से लाहौर बाबा चिश्ती (संगीतकार
ग़ुलाम अहमद चिश्ती) के पास ले गई जिनके फ़िल्मी घरानों में ख़ूब ताल्लुक़ात थे. लाहौर तब फ़िल्मों का गढ़ हुआ करता था.
बाबा चिश्ती के यहाँ ख़य्याम एक ट्रेनी की तरह उन्हीं के घर पर रहने लगे और संगीत सीखने लगे.
दूरदर्शन समेत अपनी कई इंटरव्यू
में ख़य्याम ये क़िस्सा ज़रूर सुनाते हैं, "एक बार बीआर चोपड़ा बाबा
चिश्ती के घर पर थे और चिश्ती साहब सबको तनख़्वाह बाँट रहे थे. लेकिन बीआर
चोपड़ा ने देखा कि मुझे पैसे नहीं मिले. चोपड़ा साहब के पूछने पर बाबा
चिश्ती ने बताया कि इस नौजवान के साथ तय हुआ है कि ये संगीत सीखेगा और मेरे
घर पर रहेगा पर पैसे नहीं मिलेंगे. लेकिन बीआर चोपड़ा ने कहा कि मैंने
देखा है कि सबसे ज़्यादा काम तो यही करता है. बस बीआर चोपड़ा ने उसी वक़्त
मुझे 120 रुपए महीने की तनख़्वाह थमाई और चोपड़ा ख़ानदान के साथ रिश्ता बन
गया."
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